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mahabharat 12.27.31: आलस्य सुखरूप प्रतीत होता है, किन्तु उसका अन्त दुःख है और कार्यकुशलता दुःखरूप प्रतीत होती है, किन्तु उससे सुख उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त धन, लक्ष्मी, शील, धैर्य और यश- ये कार्यकुशल व्यक्ति में ही निवास करते हैं, आलसी व्यक्ति में नहीं ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 12.27: युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 27: युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.27.31 
सुखं दु:खान्तमालस्यं दाक्ष्यं दु:खं सुखोदयम्।
भूति: श्रीर्ह्रीर्धृति: कीर्तिर्दक्षे वसति नालसे॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
आलस्य सुखरूप प्रतीत होता है, किन्तु उसका अन्त दुःख है और कार्यकुशलता दुःखरूप प्रतीत होती है, किन्तु उससे सुख उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त धन, लक्ष्मी, शील, धैर्य और यश- ये कार्यकुशल व्यक्ति में ही निवास करते हैं, आलसी व्यक्ति में नहीं ॥31॥
 
Laziness appears to be a form of happiness, but its end is sorrow and efficiency appears to be a form of sorrow, but it gives rise to happiness. Apart from this, wealth, Lakshmi, modesty, patience and fame - these reside only in an efficient person, not in a lazy person. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)