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mahabharat 12.27.29-30h: जिस प्रकार जल में बुलबुले उत्पन्न होते हैं और लुप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार इस संसार में जीवों का एक दूसरे से मिलन निश्चित रूप से वियोग में ही समाप्त होता है।   |   mahabharat अध्याय 12.27: युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 27: युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना  »  श्लोक 29-30h
 
 
श्लोक  12.27.29-30h 
संयोगा विप्रयोगान्ता जातानां प्राणिनां ध्रुवम्॥ २९॥
बुद्‍बुदा इव तोयेषु भवन्ति न भवन्ति च।
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार जल में बुलबुले उत्पन्न होते हैं और लुप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार इस संसार में जीवों का एक दूसरे से मिलन निश्चित रूप से वियोग में ही समाप्त होता है।
 
Just like bubbles appear and disappear in water, similarly the union of living beings in this world with each other surely ends in separation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)