Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.27.20-22h: जब मैंने राज्य के लोभ में पर्वतों पर उत्पन्न सिंह के समान पराक्रमी अभिमन्यु को द्रोणाचार्य द्वारा रक्षित कौरव सेना में फेंक दिया, तब भ्रूणहत्या करने वाले पापी के समान मैं अर्जुन और कमलनेत्र श्रीकृष्ण की ओर आँखें उठाकर भी नहीं देख पा रहा हूँ।   |   mahabharat अध्याय 12.27: युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 27: युधिष्ठिरको शोकवश शरीर त्याग देनेके लिये उद्यत देख व्यासजीका उन्हें उससे निवारण करके समझाना  »  श्लोक 20-22h
 
 
श्लोक  12.27.20-22h 
अभिमन्युं च यद् बालं जातं सिंहमिवाद्रिषु॥ २०॥
प्रावेशयमहं लुब्धो वाहिनीं द्रोणपालिताम्।
तदाप्रभृति बीभत्सुं न शक्नोमि निरीक्षितुम्॥ २१॥
कृष्णं च पुण्डरीकाक्षं किल्बिषी भ्रूणहा यथा।
 
 
अनुवाद
जब मैंने राज्य के लोभ में पर्वतों पर उत्पन्न सिंह के समान पराक्रमी अभिमन्यु को द्रोणाचार्य द्वारा रक्षित कौरव सेना में फेंक दिया, तब भ्रूणहत्या करने वाले पापी के समान मैं अर्जुन और कमलनेत्र श्रीकृष्ण की ओर आँखें उठाकर भी नहीं देख पा रहा हूँ।
 
When, in greed for the kingdom, I threw Abhimanyu, who was as valiant as a lion born on mountains, into the Kaurava army protected by Dronacharya, then like a sinner who kills foetus, I am unable to look at Arjun and the lotus-eyed Shri Krishna with raised eyes.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)