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mahabharat 12.269.65: गृहस्थाश्रम के अनुसार यह जो कर्म है, जो परिवार के भरण-पोषण से संबंधित है तथा दान, स्वाध्याय, यज्ञ, संतानोत्पत्ति आदि कर्मों का स्वरूप है और सदैव सरल एवं सौम्य भाव से आचरण करना, ये सब मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन हैं ॥65॥   |   mahabharat अध्याय 12.269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  12.269.65 
इदं तु दुष्करं कर्म कुटुम्बमभिसंश्रितम्।
दानमध्ययनं यज्ञ: प्रजासंतानमार्जवम्॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
गृहस्थाश्रम के अनुसार यह जो कर्म है, जो परिवार के भरण-पोषण से संबंधित है तथा दान, स्वाध्याय, यज्ञ, संतानोत्पत्ति आदि कर्मों का स्वरूप है और सदैव सरल एवं सौम्य भाव से आचरण करना, ये सब मनुष्य के लिए अत्यंत कठिन हैं ॥65॥
 
According to Grihasthashram, this work which is related to the maintenance of the family and the form of work like charity, self-study, yagya, procreation and always behaving with simple and gentle spirit, all these are very difficult for a human being. 65॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)