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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद  »  श्लोक 63-64
 
 
श्लोक  12.269.63-64 
शक्यं त्वेकेन युक्तेन कृतकृत्येन सर्वश:।
पिण्डमात्रं व्यपाश्रित्य चरितुं विजितात्मना॥ ६३॥
वेदवादं व्यपाश्रित्य मोक्षोऽस्तीति प्रभाषितुम्।
अपेतन्यायशास्त्रेण सर्वलोकविगर्हिणा॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
जो तुम्हारे समान एकान्तवासी, योग में तत्पर, सिद्ध और मन को जीत लेने वाला है, जो शरीर की सहायता से या शरीर की रक्षा के लिए थोड़े से दान से ही सब दिशाओं में भ्रमण कर सकता है, जिसने तर्कशास्त्र का परित्याग कर दिया है और जो नाशवान होने के कारण सम्पूर्ण जगत को तुच्छ समझता है, वही पुरुष वेद की ऋचाओं का आश्रय लेकर अधिकारपूर्वक कह ​​सकता है कि 'मोक्ष है।'
 
He who, like you, is solitary, absorbed in yoga, accomplished and has conquered the mind, who can travel in all directions with only the help of the body or a little alms for its protection, who has abandoned the science of logic and who considers the entire world to be despicable because of its perishability, only such a man, taking recourse to the verses of the Vedas, can say with authority that 'there is salvation.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)