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mahabharat 12.269.25: किसी को गाली न देना, व्यर्थ न बोलना, दूसरों की चुगली या निन्दा न करना, कम बोलना, सत्य बोलना और इस विषय में सदैव सावधान रहना - ऐसा करने से वाणी इन्द्रिय का द्वार सुरक्षित रहता है ॥25॥   |   mahabharat अध्याय 12.269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 269: प्रवृत्ति एवं निवृत्तिमार्गके विषयमें स्यूमरश्मि-कपिल-संवाद  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.269.25 
नाक्रोशमृच्छेन्न वृथा वदेच्च
न पैशुनं जनवादं च कुर्यात्।
सत्यव्रतो मितभाषोऽप्रमत्त-
स्तथास्य वाग्द्वारमथो सुगुप्तम्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
किसी को गाली न देना, व्यर्थ न बोलना, दूसरों की चुगली या निन्दा न करना, कम बोलना, सत्य बोलना और इस विषय में सदैव सावधान रहना - ऐसा करने से वाणी इन्द्रिय का द्वार सुरक्षित रहता है ॥25॥
 
Do not abuse anyone, do not speak unnecessarily, do not backbite or criticise others, be of few words, speak the truth and be always cautious about this - by doing so the door of the speech sense is protected. ॥25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)