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mahabharat 12.268.39: अतः विप्रवर! प्रत्येक द्विज को निष्काम भाव से यज्ञ करना चाहिए। जो मनुष्य दिव्य भाव से यज्ञ करता है, वह शरीर त्यागने के बाद महान दिव्य फल प्राप्त करता है। 39॥   |   mahabharat अध्याय 12.268: स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 268: स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  12.268.39 
तस्माद् ब्रह्मन् यजेच्चैव याजयेच्चाविचारयन्।
यजत: स्वर्गविधिना प्रेत्य स्वर्गफलं महत्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
अतः विप्रवर! प्रत्येक द्विज को निष्काम भाव से यज्ञ करना चाहिए। जो मनुष्य दिव्य भाव से यज्ञ करता है, वह शरीर त्यागने के बाद महान दिव्य फल प्राप्त करता है। 39॥
 
Hence Vipravara! Every Dwija should perform and perform Yagya without any thought. One who performs Yagya in a heavenly manner, attains great heavenly rewards after leaving his body. 39॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)