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श्री महाभारत
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पर्व 12: शान्ति पर्व
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अध्याय 268: स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण
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श्लोक 32
श्लोक
12.268.32
यज्ञाङ्गान्यपि चैतानि यज्ञोक्तान्यनुपूर्वश:।
विधिना विधियुक्तानि धारयन्ति परस्परम्॥ ३२॥
अनुवाद
यज्ञ शास्त्र में क्रमशः वर्णित ये सभी हवन सामग्री यज्ञ में उचित रीति से प्रयुक्त होती हैं तथा एक-दूसरे को धारण करती हैं।
All these sacrificial objects, described respectively in the Yagya Shastra, are used in the Yagya in a proper manner and hold each other.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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