श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 268: स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  12.268.31 
न हिनस्ति नारभते नाभिद्रुह्यति किंचन।
यज्ञो यष्टव्य इत्येव यो यजत्यफलेप्सया॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य यज्ञ करना अपना कर्तव्य समझता है, वह फल की आशा न रखते हुए यज्ञ करता है, न तो हिंसा करता है, न किसी के प्रति बेईमानी करता है और न अहंकारपूर्वक कोई कार्य आरम्भ करता है ॥31॥
 
Knowing that performing a sacrifice is one's duty, one who performs a sacrifice without any expectation of its fruit neither commits violence nor does he dishonestly act against anyone, nor does he begin any task with arrogance. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)