श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 268: स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण  »  श्लोक 27-28
 
 
श्लोक  12.268.27-28 
अङ्गान्येतानि यज्ञस्य यज्ञो मूलमिति श्रुति:।
आज्येन पयसा दध्ना शकृताऽऽमिक्षया त्वचा॥ २७॥
बालै: शृङ्गेण पादेन सम्भवत्येव गौर्मखम्।
एवं प्रत्येकश: सर्वं यद् यदस्य विधीयते॥ २८॥
 
 
अनुवाद
ये सब यज्ञ के अंग हैं और यज्ञ ही इस जगत् की उत्पत्ति का मूल कारण है; ऐसा श्रुतिका का कथन है। घी, दूध, दही, छाछ, गोबर, चमड़ा, बाल, सींग और पैर - इन सबके द्वारा गाय यज्ञ का अनुष्ठान करती है। अतः इनमें से प्रत्येक वस्तु, जो भी विहित हो, एकत्रित करनी चाहिए।॥27-28॥
 
All these are parts of Yajna and Yajna is the root cause of the existence of this world; this is the statement of Shrutika. Ghee, milk, curd, buttermilk, cow dung, leather, hair, horns and feet – the cow performs Yajna rituals through all these. Thus, each of these things, whichever is prescribed, should be collected.॥27-28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)