श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 268: स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.268.25 
ओषध्य: पशवो वृक्षा वीरुदाज्यं पयो दधि।
हविर्भूमिर्दिश: श्रद्धा कालश्चैतानि द्वादश॥ २५॥
 
 
अनुवाद
औषधियाँ (अन्न आदि), पशु, वृक्ष, लताएँ, घी, दूध, दही, अन्य वस्तुएँ, भूमि, दिशा, श्रद्धा और काल - ये यज्ञ के बारह अंग हैं ॥25॥
 
Medicines (food etc.), animals, trees, creepers, ghee, milk, curd, other things, land, direction, faith and time - these are the twelve parts of Yagya. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)