श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 268: स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.268.18 
स्यूमरश्मिरुवाच
स्वर्गकामो यजेतेति सततं श्रूयते श्रुति:।
फलं प्रकल्प्य पूर्वं हि ततो यज्ञ: प्रतायते॥ १८॥
 
 
अनुवाद
स्यूमरश्मि ने कहा - 'स्वर्ग की इच्छा रखने वाले मनुष्य को यज्ञ करना चाहिए', यह श्रुति सदैव सुनी जाती है। अतः मनुष्य पहले स्वर्ग के फल की कल्पना करता है और फिर यज्ञ का अनुष्ठान आरम्भ करता है। 18॥
 
Syumarshmin said – 'A man who desires heaven should perform yajna', this shruti is always heard. Therefore, man first imagines the fruit of heaven and then starts the ritual of Yagya. 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)