श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 268: स्यूमरश्मि और कपिलका संवाद—स्यूमरश्मिके द्वारा यज्ञकी अवश्यकर्तव्यताका निरूपण  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.268.13 
गच्छत्येव परित्यागी वानप्रस्थश्च गच्छति।
गृहस्थो ब्रह्मचारी च उभौ तावपि गच्छत:॥ १३॥
 
 
अनुवाद
संन्यासी भी परम गति को प्राप्त कर सकता है, वानप्रस्थ भी वहाँ जा सकता है। गृहस्थ और ब्रह्मचारी - दोनों भी उसी गति को प्राप्त कर सकते हैं॥13॥
 
A Sanyasi can attain the supreme state, a Vanaprastha can also go there. A householder and a Brahmachari - both can also attain the same state.॥13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)