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श्लोक  12.267.4 
अधर्मतां याति धर्मो यात्यधर्मश्च धर्मताम्।
वधो नाम भवेद् धर्मो नैतद् भवितुमर्हति॥ ४॥
 
 
अनुवाद
पिताजी, यह सच है कि कभी-कभी ऊपर से पुण्य प्रतीत होने वाला कार्य पाप में बदल जाता है, और पाप भी धर्म में बदल जाता है। लेकिन यह कभी संभव नहीं कि किसी जीव की हत्या भी धर्म हो।
 
Father, it is true that sometimes an act which appears to be righteous on the surface turns into an act of sin, and even sin turns into a act of religion. However, it is never possible that killing a creature is also a act of religion.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)