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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 77
 
 
श्लोक  12.266.77 
ब्रुवतश्च परस्यापि वाक्यं धर्मोपसंहितम्।
चिरं पृष्टोऽपि च ब्रूयाच्चिरं न परितप्यते॥ ७७॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई व्यक्ति धर्मोपदेशक से कोई प्रश्न पूछे, तो उसे उत्तर देने से पहले उस पर बहुत देर तक विचार करना चाहिए। ऐसा करने से उसे लंबे समय तक पछताना नहीं पड़ेगा।
 
If someone asks a question to a person preaching Dharma, he should think over it for a long time before giving an answer. By doing so, he will not have to repent for a long time.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)