श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 76
 
 
श्लोक  12.266.76 
चिरमन्वास्य विदुषश्चिरं शिष्टान् निषेव्य च।
चिरं विनीय चात्मानं चिरं यात्यनवज्ञताम्॥ ७६॥
 
 
अनुवाद
बहुत समय तक विद्वानों की संगति करने, बहुत समय तक सज्जनों की सेवा करने तथा बहुत समय तक मन को वश में रखने से मनुष्य बहुत समय तक अवज्ञाकारी नहीं रहता, अपितु उसका आदर होता है ॥ 76॥
 
By associating with learned people for a long time, serving courteous people for a long time and keeping one's mind under control for a long time, a man is not disobedient for a long time, but rather he is respected. ॥ 76॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)