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mahabharat 12.266.64: गौतम ने अपने पुत्र को अपने चरणों में प्रणाम करते देखा और सोचा कि शायद चिरकालिक भय के कारण वह हथियार उठाने की अपनी चपलता को छिपा रहा है।   |   mahabharat अध्याय 12.266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.266.64 
बुद्धिश्चासीत् सुतं दृष्ट्वा पितुश्चरणयोर्नतम्।
शस्त्रग्रहणचापल्यं संवृणोति भयादिति॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
गौतम ने अपने पुत्र को अपने चरणों में प्रणाम करते देखा और सोचा कि शायद चिरकालिक भय के कारण वह हथियार उठाने की अपनी चपलता को छिपा रहा है।
 
Gautama saw his son bowing at his feet and thought that perhaps due to chronic fear he was concealing his agility in carrying weapons. 64
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)