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mahabharat 12.266.52: जिसे मैंने पत्नी के रूप में अपने घर में आश्रय दिया था, जो एक पतिव्रता स्त्री थी और जो मेरी पत्नी होने के नाते मेरे भरण-पोषण की अधिकारी थी, उसे मैंने प्रमाद के व्यसन के वश में होकर मरवा दिया। अब मुझे इस पाप से कौन बचाएगा?   |   mahabharat अध्याय 12.266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.266.52 
हत्वा साध्वीं च नारीं च व्यसनित्वाच्च वासिताम्।
भर्तव्यत्वेन भार्यां च को नु मां तारयिष्यति॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
जिसे मैंने पत्नी के रूप में अपने घर में आश्रय दिया था, जो एक पतिव्रता स्त्री थी और जो मेरी पत्नी होने के नाते मेरे भरण-पोषण की अधिकारी थी, उसे मैंने प्रमाद के व्यसन के वश में होकर मरवा दिया। अब मुझे इस पाप से कौन बचाएगा?
 
'The one whom I had given shelter in my house as my wife, who was a virtuous woman and who was entitled to my maintenance as my wife, I got her killed because I was under the influence of the addiction of negligence. Now who will save me from this sin?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)