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श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  12.266.5 
चिरं स चिन्तयत्यर्थांश्चिरं जाग्रच्चिरं स्वपन्।
चिरं कार्याभिपत्तिं च चिरकारी तथोच्यते॥ ५॥
 
 
अनुवाद
वह बहुत देर तक सब बातों पर विचार करता, बहुत देर तक जागता, बहुत देर तक सोता तथा बहुत विलम्ब से अपना कार्य पूरा करता था; इसीलिए सब लोग उसे चिरकारी कहने लगे।
 
He used to ponder over all matters for a long time, stay awake for a long time, sleep for a long time, and complete his work only after a long delay; that is why everyone started calling him Chirakari. 5.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)