Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.266.47-48: ओह! तीनों लोकों के स्वामी इंद्र ब्राह्मण वेश में मेरे आश्रम में आए। मैंने गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए अतिथियों का सत्कार किया, उन्हें मधुर वचनों से सान्त्वना दी, उनका स्वागत किया, उन्हें जल आदि से विधिपूर्वक अर्घ्य दिया तथा स्वयं भी विधिपूर्वक उनका पूजन किया। | mahabharat अध्याय 12.266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
आश्रमं मम सम्प्राप्तस्त्रिलोकेश: पुरंदर:।
अतिथिव्रतमास्थाय ब्राह्मणं रूपमास्थित:॥ ४७॥
स मया सान्त्वितो वाग्भि: स्वागतेनाभिपूजित:।
अर्घ्यं पाद्यं यथान्यायं मया च प्रतिपादित:॥ ४८॥
अनुवाद
ओह! तीनों लोकों के स्वामी इंद्र ब्राह्मण वेश में मेरे आश्रम में आए। मैंने गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए अतिथियों का सत्कार किया, उन्हें मधुर वचनों से सान्त्वना दी, उनका स्वागत किया, उन्हें जल आदि से विधिपूर्वक अर्घ्य दिया तथा स्वयं भी विधिपूर्वक उनका पूजन किया।
‘Oh! The Lord of the three worlds, Indra, came to my hermitage in the guise of a Brahmin. I followed the custom of a householder to welcome guests and consoled him with sweet words, welcomed him and offered him water and water etc. in a proper manner and I myself worshipped him according to the rituals.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥