श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 45-46
 
 
श्लोक  12.266.45-46 
मेधातिथिर्महाप्राज्ञो गौतमस्तपसि स्थित:।
विमृश्य तेन कालेन पत्न्या: संस्थाव्यतिक्रमम्॥ ४५॥
सोऽब्रवीद् भृशसंतप्तो दु:खेनाश्रूणि वर्तयन्।
श्रुतधैर्यप्रसादेन पश्चात्तापमुपागत:॥ ४६॥
 
 
अनुवाद
उस समय परम ज्ञानी और तपस्वी गौतम अपनी पत्नी के वध की अनुचितता का विचार करके अत्यन्त व्याकुल हो उठे। वे शोक के आँसू बहाते हुए वेदाध्ययन और धैर्य के बल से किसी प्रकार अपने को रोककर पश्चाताप करते हुए अपने मन में इस प्रकार कहने लगे -॥45-46॥
 
At that time, Gautama, a person of immense knowledge and devoted to penance, became very upset on thinking about the impropriety of killing his wife. While shedding tears of sorrow, he somehow managed to control himself by the power of study of Vedas and patience and while repenting, he started saying to himself like this -॥ 45-46॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)