श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  12.266.23 
मुच्यते बन्धनात् पुष्पं फलं वृक्षात् प्रमुच्यते।
क्लिश्यन्नपि सुतं स्नेहै: पिता पुत्रं न मुञ्चति॥ २३॥
 
 
अनुवाद
फूल डंठल से अलग हो जाता है, फल वृक्ष से अलग हो जाता है; परन्तु पिता चाहे कितना ही दुःखी क्यों न हो, अपने लाड़ले और प्यारे पुत्र को कभी नहीं छोड़ता। अर्थात् पुत्र कभी पिता से अलग नहीं हो सकता॥ 23॥
 
‘The flower gets separated from its stalk, the fruit gets separated from its tree; but a father, no matter how much pain he may be in, never abandons his pampered and loving son. That is, a son can never be separated from his father.॥ 23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)