श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.266.22 
आशिषस्ता भजन्त्येनं परुषं प्राह यत् पिता।
निष्कृति: सर्वपापानां पिता यच्चाभिनन्दति॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘यदि पिता अपने पुत्र से कुछ कठोर वचन कहे, तो वह उन्हें आशीर्वाद समझकर ग्रहण कर लेता है, और यदि पिता अपने पुत्र को नमस्कार करे – मधुर वचन बोले तथा उसके प्रति प्रेम और आदर प्रकट करे, तो इससे पुत्र के समस्त पापों का प्रायश्चित हो जाता है।॥ 22॥
 
‘If a father says some harsh words to his son, he accepts them as blessings, and if the father greets his son – speaks sweet words and shows love and respect to him, this atones for all the sins of the son.॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)