श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  12.266.21 
पिता धर्म: पिता स्वर्ग: पिता हि परमं तप:।
पितरि प्रीतिमापन्ने सर्वा: प्रीयन्ति देवता:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
‘इसीलिए पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सबसे बड़ी तपस्या है। पिता के प्रसन्न होने पर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं।॥21॥
 
‘That is why father is religion, father is heaven and father is the greatest penance. When father is pleased, all the gods become pleased.॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)