श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.266.18 
प्रीतिमात्रं पितु: पुत्र: सर्वं पुत्रस्य वै पिता।
शरीरादीनि देयानि पिता त्वेक: प्रयच्छति॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘पुत्र ही पिता का पूर्ण प्रेम है और पिता ही पुत्र का सर्वस्व है। पिता ही पुत्र को देने योग्य सब वस्तुएँ, शरीर सहित, देता है।॥18॥
 
‘The son is the complete love of the father and the father is the son's everything. Only the father gives all the things to be given to the son, including the body.॥ 18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)