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mahabharat 12.266.15: अतः माता और पिता दोनों ने ही मुझे पुत्र रूप में जन्म दिया है। मैं उन दोनों को ही अपने जन्म का कारण मानता हूँ। इस ज्ञान को मैं सदा क्यों न रखूँ?॥15॥   |   mahabharat अध्याय 12.266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.266.15 
सोऽहं मात्रा स्वयं पित्रा पुत्रत्वे प्रकृत: पुन:।
विज्ञानं मे कथं न स्याद् द्वौ बुद्धॺे चात्मसम्भवम्॥ १५॥
 
 
अनुवाद
अतः माता और पिता दोनों ने ही मुझे पुत्र रूप में जन्म दिया है। मैं उन दोनों को ही अपने जन्म का कारण मानता हूँ। इस ज्ञान को मैं सदा क्यों न रखूँ?॥15॥
 
‘Therefore, both the mother and father have given me birth as a son. I consider both of them to be the reason for my birth. Why should I not keep this knowledge forever?॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)