श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.266.13 
अनवज्ञा पितुर्युक्ता धारणं मातृरक्षणम्।
युक्तक्षमावुभावेतौ नातिवर्तेत मां कथम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
पिता का अनादर करना उचित नहीं है, और साथ ही माता की रक्षा करना भी पुत्र का कर्तव्य है। ये दोनों कर्तव्य उचित और योग्य हैं। मैं इनका उल्लंघन कैसे न करूँ?
 
‘It is not right to disrespect one's father, and at the same time it is the duty of a son to protect his mother. Both these duties are appropriate and worthy. How can I not violate them?
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)