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mahabharat 12.266.11: पिता की आज्ञा का पालन करना परम धर्म है और माता की रक्षा करना पुत्र का प्रधान कर्तव्य है। पुत्र कभी स्वतंत्र नहीं होता, वह सदैव माता-पिता के अधीन रहता है। अतः मैं ऐसा क्या करूँ कि मुझे धर्म की हानि का दुःख न सहना पड़े? ॥11॥   |   mahabharat अध्याय 12.266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.266.11 
पितुराज्ञा परो धर्म: स्वधर्मो मातृरक्षणम्।
अस्वतन्त्रं च पुत्रत्वं किं तु मां नानुपीडयेत्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
पिता की आज्ञा का पालन करना परम धर्म है और माता की रक्षा करना पुत्र का प्रधान कर्तव्य है। पुत्र कभी स्वतंत्र नहीं होता, वह सदैव माता-पिता के अधीन रहता है। अतः मैं ऐसा क्या करूँ कि मुझे धर्म की हानि का दुःख न सहना पड़े? ॥11॥
 
'Following the orders of the father is the ultimate religion and protecting the mother is the prime duty of a son. A son is never independent, he always remains under the control of his parents. So what should I do so that I do not suffer the pain of loss of religion? ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)