श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.266.10 
पितुराज्ञां कथं कुर्यां न हन्यां मातरं कथम्।
कथं धर्मच्छलेनास्मिन् निमज्जेयमसाधुवत्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
उसने सोचा, 'मैं ऐसा कौन-सा उपाय करूँ जिससे पिता की आज्ञा का पालन कर सकूँ और माता का वध न करना पड़े? धर्म के नाम पर मुझ पर यह महान् संकट आ पड़ा है। मैं अन्य दुष्ट मनुष्यों की भाँति इसमें डूबने का साहस कैसे कर सकता हूँ?॥10॥
 
He thought, 'What solution should I adopt so that I can obey my father's orders and not have to kill my mother? This great problem has fallen on me in the name of religion. How can I dare to drown myself in this like other wicked men?॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)