श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 266: महर्षि गौतम और चिरकारीका उपाख्यान—दीर्घकालतक सोच-विचारकर कार्य करनेकी प्रशंसा  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.266.1 
युधिष्ठिर उवाच
कथं कार्यं परीक्षेत शीघ्रं वाथ चिरेण वा।
सर्वथा कार्यदुर्गेऽस्मिन् भवान् न: परमो गुरु:॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह! आप मेरे परम गुरु हैं। कृपया मुझे बताएँ कि यदि कभी ऐसा कार्य उपस्थित हो जाए, जो गुरुजनों की आज्ञा से तो करना ही है, किन्तु हिंसात्मक होने के कारण कठिन और अनुचित प्रतीत हो, तो ऐसे अवसर पर उस कार्य का मूल्यांकन किस प्रकार किया जाए? क्या उसे शीघ्रतापूर्वक करना चाहिए या उस पर बहुत देर तक विचार करना चाहिए?॥1॥
 
Yudhishthira asked - Grandfather! You are my supreme teacher. Please tell me that if ever such a task presents itself, which is a must do because of the orders of the teachers, but seems difficult and inappropriate because it is violent, then how should that task be evaluated on such an occasion? Should it be done quickly or should it be thought over for a long time?॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)