Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.265.8: यदि हम यह कहें कि मनुष्य जो वृक्ष 'यूप' बनाने के लिए काटते हैं तथा यज्ञ के लिए पशुबलि देकर जो मांस खाते हैं, वह व्यर्थ नहीं, अपितु धर्म है, तो यह बात सही नहीं है, क्योंकि ऐसे धर्म की कोई कद्र नहीं करता। | mahabharat अध्याय 12.265: राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यदि यज्ञांश्च वृक्षांश्च यूपांश्चोद्दिश्य मानवा:।
वृथा मांसं न खादन्ति नैष धर्म: प्रशस्यते॥ ८॥
अनुवाद
यदि हम यह कहें कि मनुष्य जो वृक्ष 'यूप' बनाने के लिए काटते हैं तथा यज्ञ के लिए पशुबलि देकर जो मांस खाते हैं, वह व्यर्थ नहीं, अपितु धर्म है, तो यह बात सही नहीं है, क्योंकि ऐसे धर्म की कोई कद्र नहीं करता।
If we say that the trees which humans cut for the purpose of making 'yup' and the meat which they eat after sacrificing animals for the purpose of Yagya is not useless but is a Dharma (righteousness), then it is not correct because no one appreciates such a Dharma. 8.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥