Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.265.13: युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह ! जो मनुष्य हिंसा से दूर रहता है, उसका शरीर और आपत्तियाँ आपस में वाद-विवाद करने लगती हैं - आपत्तियाँ शरीर का शोषण करती हैं और शरीर आपत्तियों का नाश करना चाहता है; अतः जो मनुष्य सूक्ष्म हिंसा के भय से कृषि आदि कोई भी कार्य आरम्भ नहीं करता, उसकी देह यात्रा कैसे चलेगी ? 13॥ | mahabharat अध्याय 12.265: राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
युधिष्ठिर उवाच
शरीरमापदश्चापि विवदन्त्यविहिंसत:।
कथं यात्रा शरीरस्य निरारम्भस्य सेत्स्यते॥ १३॥
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह ! जो मनुष्य हिंसा से दूर रहता है, उसका शरीर और आपत्तियाँ आपस में वाद-विवाद करने लगती हैं - आपत्तियाँ शरीर का शोषण करती हैं और शरीर आपत्तियों का नाश करना चाहता है; अतः जो मनुष्य सूक्ष्म हिंसा के भय से कृषि आदि कोई भी कार्य आरम्भ नहीं करता, उसकी देह यात्रा कैसे चलेगी ? 13॥
Yudhishthir asked – Grandfather! In a man who stays away from violence, his body and objections start arguing with each other - the objections exploit the body and the body wants to destroy the objections; Therefore, how will the physical journey of a man who does not start any work like agriculture etc. due to fear of subtle violence be carried out? 13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥