श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 265: राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा  » 
 
 
अध्याय 265: राजा विचख्नुके द्वारा अहिंसा-धर्मकी प्रशंसा
 
श्लोक 1:  भीष्म बोले, 'हे राजन! प्राचीन काल में राजा विचख्नु ने समस्त प्राणियों पर दया करने की इच्छा प्रकट की थी। इस संदर्भ में ज्ञानीजन इस प्राचीन कथा का उदाहरण देते हैं।
 
श्लोक 2:  एक बार राजा ने एक यज्ञ-वेदी में देखा कि एक बैल की गर्दन कटी हुई है और बहुत सी गायें पीड़ा से कराह रही हैं। यज्ञ-वेदी के आँगन में बहुत सी गायें खड़ी थीं। यह सब देखकर राजा बोले -॥2॥
 
श्लोक 3:  संसार की समस्त गौएँ समृद्ध हों।’ जब हिंसा आरम्भ होने वाली थी, तब उन्होंने गौओं के लिए यह मंगल कामना व्यक्त की तथा उस हिंसा का निषेध करते हुए कहा -॥3॥
 
श्लोक 4:  जो लोग धर्म की मर्यादा से विमुख हो गए हैं, मूर्ख हैं, नास्तिक हैं, आत्मा के विषय में संदेह रखते हैं और कहीं भी प्रसिद्ध नहीं हैं, ऐसे लोगों ने हिंसा का समर्थन किया है ॥4॥
 
श्लोक 5:  धर्मात्मा मनु ने अपने सभी कार्यों में अहिंसा का पालन करने का उपदेश दिया है। मनुष्य अपनी इच्छा से यज्ञ की बाह्य वेदी पर पशुबलि चढ़ाते हैं।
 
श्लोक 6:  अतः ज्ञानी पुरुष को वैदिक प्रमाणों से धर्म के सूक्ष्म स्वरूप का निर्णय करना उचित है। समस्त प्राणियों के लिए बताए गए धर्मों में अहिंसा को सबसे श्रेष्ठ माना गया है ॥6॥
 
श्लोक 7:  व्रत के कठोर नियमों का पालन करो। वेदों की शिक्षाओं का त्याग करो, अर्थात् वासनापूर्ण कर्मों को छोड़ दो, सकाम कर्मों के आचरण को अनैतिक समझो और उनमें लिप्त मत होओ। केवल कृपण (क्षुद्र) लोग ही फल की इच्छा से कर्म करते हैं। 7॥
 
श्लोक 8:  यदि हम यह कहें कि मनुष्य जो वृक्ष 'यूप' बनाने के लिए काटते हैं तथा यज्ञ के लिए पशुबलि देकर जो मांस खाते हैं, वह व्यर्थ नहीं, अपितु धर्म है, तो यह बात सही नहीं है, क्योंकि ऐसे धर्म की कोई कद्र नहीं करता।
 
श्लोक 9:  मदिरा, मदिरा, मधु, मांस, मछली, तिल और चावल का दलिया - ये सब वस्तुएं धूर्तों द्वारा यज्ञों में प्रचलित कर दी गई हैं। वेदों में इनके प्रयोग का विधान नहीं है॥9॥
 
श्लोक 10h:  उन धूर्त लोगों ने मान, मोह और लोभ के वशीभूत होकर इन वस्तुओं के प्रति अपना लोभ प्रकट किया है ॥91/2॥
 
श्लोक 10-11h:  ब्राह्मण समस्त यज्ञों में भगवान विष्णु का ही आदर करते हैं और खीर, पुष्प आदि से उनकी पूजा का विधान है। 10 1/2॥
 
श्लोक 11-12:  वेदों में वर्णित यज्ञ-सम्बन्धी वृक्षों का ही यज्ञ में प्रयोग करना चाहिए। उत्तम आचरण और शुद्ध विचारों वाला महापुरुष अपनी शुद्ध भावनाओं से जो हविष्य या नैवेद्य तैयार करता है और प्रोक्षण आदि द्वारा उत्तम अनुष्ठान करता है, वह सब देवताओं को अर्पण करने योग्य है। 11-12॥
 
श्लोक 13:  युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह ! जो मनुष्य हिंसा से दूर रहता है, उसका शरीर और आपत्तियाँ आपस में वाद-विवाद करने लगती हैं - आपत्तियाँ शरीर का शोषण करती हैं और शरीर आपत्तियों का नाश करना चाहता है; अतः जो मनुष्य सूक्ष्म हिंसा के भय से कृषि आदि कोई भी कार्य आरम्भ नहीं करता, उसकी देह यात्रा कैसे चलेगी ? 13॥
 
श्लोक 14:  भीष्मजी बोले - युधिष्ठिर ! मनुष्य को इस प्रकार कर्मों में प्रवृत्त होना चाहिए कि शरीर का बल सर्वथा क्षीण न हो जाए, जिससे वह मृत्यु के अधीन न हो जाए; क्योंकि शरीर के बलवान होने पर ही मनुष्य धर्म का पालन कर सकता है ॥14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)