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श्लोक 12.263.44-45  |
भीष्म उवाच
एतानीदृशकान् धर्मांस्तुलाधार: प्रशंसति॥ ४४॥
उपपत्त्याभिसम्पन्नान् नित्यं सद्भिर्निषेवितान्॥ ४५॥ |
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| अनुवाद |
| भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर ! इस प्रकार तुलाधार वैश्य सदैव उन धर्मों की प्रशंसा करते थे जो अहिंसक, विवेकपूर्ण और श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा सेवित हों ॥44-45॥ |
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| Bhishma says - Yudhishthira! In this way, Tuladhar Vaishya always praised those religions which are non-violent, reasonable and served by noble men. ॥ 44-45॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि तुलाधारजाजलिसंवादे त्रिषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६३॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तुलाधार और जाजलिका संवादविषयक दो सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६३॥
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