Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.263.43-44h: हे जाजले! यह आत्मा ही मुख्य तीर्थ है। तीर्थ की खोज में देश-देशान्तर मत भटको। जो मेरे द्वारा यहाँ बताए गए अहिंसा-आधारित धर्मों का आचरण करता है और विशेष हेतु से धर्म का अनुसंधान करता है, वह कल्याणकारी लोकों को प्राप्त करता है। ॥43 1/2॥ | mahabharat अध्याय 12.263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
जाजले तीर्थमात्मैव मा स्म देशातिथिर्भव।
एतानीदृशकान् धर्मानाचरन्निह जाजले॥ ४३॥
कारणैर्धर्ममन्विच्छन् स लोकानाप्नुते शुभान्।
अनुवाद
हे जाजले! यह आत्मा ही मुख्य तीर्थ है। तीर्थ की खोज में देश-देशान्तर मत भटको। जो मेरे द्वारा यहाँ बताए गए अहिंसा-आधारित धर्मों का आचरण करता है और विशेष हेतु से धर्म का अनुसंधान करता है, वह कल्याणकारी लोकों को प्राप्त करता है। ॥43 1/2॥
O Jaajale! This soul itself is the main pilgrimage. Do not wander from country to country in search of pilgrimage. One who practices the religions based on non-violence mentioned by me here and researches the religion for special reasons, attains the worlds of welfare. ॥ 43 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥