श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक  12.263.37 
जाजलिरुवाच
न वै मुनीनां शृणुम: स्म तत्त्वं
पृच्छामि ते वाणिज कष्टमेतत् ।
पूर्वे पूर्वे चास्य नावेक्षमाणा
नात: परं तमृषय: स्थापयन्ति॥ ३७॥
 
 
अनुवाद
जाजलि ने पूछा - वैश्य प्रवर! आपने जो तत्त्वज्ञान त्यागी ऋषियों के समक्ष प्रतिपादित किया है, वह मैंने कभी नहीं सुना। कदाचित् इसे समझना कठिन है, क्योंकि पूर्वकाल के महान ऋषियों ने इस पर अधिक विचार नहीं किया। जिन लोगों ने इस पर विचार किया भी है, उन्होंने इस धर्म को उत्कृष्ट होते हुए भी संसार में स्थापित नहीं किया; इसलिए मैं आपसे पूछ रहा हूँ। 37.
 
Jajali asked - Vaishya Pravar! I have never heard the philosophy propounded by you in the presence of self-sacrificing sages. Perhaps it is difficult to understand, because the great sages of the past have not given much thought to it. Even those who have given thought to it, have not established this religion in the world despite it being excellent; hence I am asking you. 37.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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