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mahabharat 12.263.36: जाजले! जो ब्राह्मण वेदों का अध्ययन, यज्ञ, ब्राह्मणों को दान आदि वर्णानुकूल कर्म नहीं करता तथा सुखमय भोगों की लालसा रखता है, वह कुमार्ग को प्राप्त होता है। किन्तु जो मनुष्य निष्काम धर्म को देवता के समान पूज्य बनाता है, वह यज्ञ के वास्तविक फल - मोक्ष को प्राप्त करता है। 36॥   |   mahabharat अध्याय 12.263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  12.263.36 
न श्रावयन् न च यजन् न ददद् ब्राह्मणेषु च।
काम्यां वृत्तिं लिप्समान: कां गतिं याति जाजले।
इदं तु दैवतं कृत्वा यथा यज्ञमवाप्नुयात्॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
जाजले! जो ब्राह्मण वेदों का अध्ययन, यज्ञ, ब्राह्मणों को दान आदि वर्णानुकूल कर्म नहीं करता तथा सुखमय भोगों की लालसा रखता है, वह कुमार्ग को प्राप्त होता है। किन्तु जो मनुष्य निष्काम धर्म को देवता के समान पूज्य बनाता है, वह यज्ञ के वास्तविक फल - मोक्ष को प्राप्त करता है। 36॥
 
Jaazle! The Brahmin who does not perform varna-appropriate activities like studying the Vedas, performing yajna, donating to Brahmins etc. and has a craving for pleasant enjoyments, attains the evil path. But a person who makes selfless religion worshipable like a god, attains the true fruit of Yagya – salvation. 36॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)