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mahabharat 12.263.34: हे ब्रह्मन्! इसलिए वे योगी-सिद्ध पुरुष औषधि और अन्न आदि से यज्ञ कर सकते हैं। वे मूर्ख मनुष्य, जैसा कि पहले कहा गया है, ऐसे यज्ञ नहीं कर सकते। कर्मफलों का त्याग करने वाले महात्माओं का ऐसा माहात्म्य है, इसीलिए मैं त्याग को सर्वोपरि रखते हुए तुमसे ऐसी बात कह रहा हूँ॥ 34॥   |   mahabharat अध्याय 12.263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  12.263.34 
ओषधीभिस्तथा ब्रह्मन् यजेरंस्ते न तादृशा:।
इति त्यागं पुरस्कृत्य तादृशं प्रब्रवीमि ते॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! इसलिए वे योगी-सिद्ध पुरुष औषधि और अन्न आदि से यज्ञ कर सकते हैं। वे मूर्ख मनुष्य, जैसा कि पहले कहा गया है, ऐसे यज्ञ नहीं कर सकते। कर्मफलों का त्याग करने वाले महात्माओं का ऐसा माहात्म्य है, इसीलिए मैं त्याग को सर्वोपरि रखते हुए तुमसे ऐसी बात कह रहा हूँ॥ 34॥
 
O Brahman! Therefore those Yogi-perfected men can perform Yagya with medicines and food etc. Those foolish people, as mentioned earlier, cannot perform such Yagya. Such is the greatness of the great souls who renounce the results of their actions, that is why I am telling you such a thing keeping renunciation in the forefront. ॥ 34॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)