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mahabharat 12.263.33: योगी-सिद्ध पुरुषों के समक्ष यज्ञ की हवन सामग्री स्वयं प्रकट हो जाती है और वे उनसे यथोचित दक्षिणा लेकर यज्ञ करते हैं। उनके पुरोहितों के समक्ष भी वह दक्षिणा स्वतः प्रकट हो जाती है। जिसका अन्तःकरण इस प्रकार शुद्ध और सिद्ध हो चुका है, वही इस पृथ्वी को प्राप्त कर सकता है॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 12.263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.263.33 
स्वयं यूपानुपादाय यजन्ते स्वाप्तदक्षिणै:।
यस्तथा भावितात्मा स्यात् स गामालब्धुमर्हति॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
योगी-सिद्ध पुरुषों के समक्ष यज्ञ की हवन सामग्री स्वयं प्रकट हो जाती है और वे उनसे यथोचित दक्षिणा लेकर यज्ञ करते हैं। उनके पुरोहितों के समक्ष भी वह दक्षिणा स्वतः प्रकट हो जाती है। जिसका अन्तःकरण इस प्रकार शुद्ध और सिद्ध हो चुका है, वही इस पृथ्वी को प्राप्त कर सकता है॥ 33॥
 
The sacrificial offerings appear by themselves to the Yogi-accomplished men and with them they perform the yagnas with sufficient dakshina. The dakshina also appears automatically to their priests. Only he, whose inner being has been purified and perfected in this manner, can attain the earth.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)