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mahabharat 12.263.23-24: केवल कुछ ही ज्ञान और बुद्धि से संपन्न महात्मागण, जो भवसागर से पार जाने की इच्छा रखते हैं, पुण्यात्माओं द्वारा सेवित परम पवित्र और पुण्यमय ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं, जहाँ न तो वे शोक करते हैं, न वहाँ से नीचे गिरते हैं, न उनके मन में किसी प्रकार की पीड़ा होती है॥ 23-24॥   |   mahabharat अध्याय 12.263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  12.263.23-24 
ज्ञानविज्ञानिन: केचित् परं पारं तितीर्षव:॥ २३॥
अतीव पुण्यदं पुण्यं पुण्याभिजनसंहितम्।
यत्र गत्वा न शोचन्ति न च्यवन्ति व्यथन्ति च॥ २४॥
 
 
अनुवाद
केवल कुछ ही ज्ञान और बुद्धि से संपन्न महात्मागण, जो भवसागर से पार जाने की इच्छा रखते हैं, पुण्यात्माओं द्वारा सेवित परम पवित्र और पुण्यमय ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं, जहाँ न तो वे शोक करते हैं, न वहाँ से नीचे गिरते हैं, न उनके मन में किसी प्रकार की पीड़ा होती है॥ 23-24॥
 
Only a few great souls, endowed with knowledge and wisdom, who desire to cross the ocean of existence, attain the most pious and meritorious Brahmaloka, served by virtuous souls, where they neither grieve, nor fall down from there, nor experience any kind of pain in their minds.॥ 23-24॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)