श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.263.1 
जाजलिरुवाच
अयं प्रवर्तितो धर्मस्तुलां धारयता त्वया।
स्वर्गद्वारं च वृत्तिं च भूतानामवरोत्स्यते॥ १॥
 
 
अनुवाद
जाजलि बोले - व्यापारी महोदय ! आप हाथ में तराजू लेकर सौदा तौलते समय जिस धर्म का उपदेश देते हैं, उससे आप स्वर्ग का द्वार तो बंद करते ही हैं, साथ ही प्राणियों की जीविका में भी बाधा डालते हैं ॥1॥
 
Jajali said – Merchant sir! With the religion you preach while weighing deals with scales in your hands, you close the door to heaven and also create obstacles in the livelihood of living beings. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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