श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 262: जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  12.262.6 
अद्रोहेणैव भूतानामल्पद्रोहेण वा पुन:।
या वृत्ति: स परो धर्मस्तेन जीवामि जाजले॥ ६॥
 
 
अनुवाद
जिस जीवन-पद्धति में किसी प्राणी को कष्ट न देना पड़े अथवा कम से कम कष्ट देकर काम चलाया जा सके, वही उत्तम धर्म है। हे जाजले! मैं उसी से जीवनयापन करता हूँ॥6॥
 
The way of life in which one does not have to harm any living being or one can manage by harming as little as possible is the best religion. O Jaajale! I live by that.॥ 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)