श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 262: जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  12.262.55 
उपपत्त्या हि सम्पन्नो यतिभिश्चैव सेव्यते।
सततं धर्मशीलैश्च निपुणेनोपलक्षित:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
यह अत्यन्त उचित बात है। तपस्वी भी इसका पालन करते हैं और पुण्यात्मा पुरुष भी विचार करके सदैव इसी धर्म का पालन करते हैं ॥ 55॥
 
This is the most reasonable thing. Even ascetics follow this and virtuous people, after giving due thought, always follow this religion. ॥ 55॥
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि तुलाधारजाजलिसंवादे द्विषष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें तुलाधार और जाजलिका संवादविषयक दो सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६२॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५५ १/२ श्लोक हैं)
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)