श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 262: जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद  »  श्लोक 53-54
 
 
श्लोक  12.262.53-54 
कारणाद् धर्ममन्विच्छेन्न लोकचरितं चरेत्।
यो हन्याद् यश्च मां स्तौति तत्रापि शृणु जाजले॥ ५३॥
समौ तावपि मे स्यातां न हि मेऽस्ति प्रियाप्रियम्।
एतदीदृशकं धर्मं प्रशंसन्ति मनीषिण:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
इस कर्म का कारण या फल क्या है ? इस पर विचार करके ही तुम्हें किसी धर्म को ग्रहण करना चाहिए । लोगों ने क्या किया है या कर रहे हैं, यह जानकर तुम्हें उनका अन्धानुकरण नहीं करना चाहिए । हे जाजले ! अब मैं तुम्हें अपने विषय में कुछ कहता हूँ, उसे सुनो । जो मुझे मारता है और जो मेरी स्तुति करता है, वे दोनों मेरे लिए समान हैं । उनमें से कोई मुझे प्रिय या अप्रिय नहीं है, बुद्धिमान पुरुष ऐसे धर्म की प्रशंसा करते हैं ॥ 53-54॥
 
What is the reason or result of this action? You should accept any religion only after considering this. You should not blindly follow people after knowing what they have done or are doing. O Jaajale! Now I tell you something about myself, listen to it, the one who kills me and the one who praises me, both are equal for me. None of them is dear or unpleasant to me, the wise men praise such a religion. ॥ 53-54॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)