श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 262: जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद  »  श्लोक 37-38
 
 
श्लोक  12.262.37-38 
ये च च्छिन्दन्ति वृषणान् ये च भिन्दन्ति नस्तकान्।
वहन्ति महतो भारान् बध्नन्ति दमयन्ति च॥ ३७॥
हत्वा सत्त्वानि खादन्ति तान् कथं न विगर्हसे।
मानुषा मानुषानेव दासभावेन भुञ्जते॥ ३८॥
 
 
अनुवाद
जो लोग बैलों को बधिया करके बाँधते हैं, उनसे भारी बोझ ढुलवाते हैं, उन्हें सताते और काम में लगाते हैं, जो बहुत से प्राणियों को मारकर खाते हैं, जो मनुष्य होकर मनुष्यों को दास बनाकर स्वयं उनके परिश्रम का फल भोगते हैं, उनकी तुम निन्दा क्यों नहीं करते?॥ 37-38॥
 
Why don't you condemn those who castrate and tie oxen, make them carry heavy loads, oppress them and put them to work, who kill and eat so many creatures, who, being men, make men their slaves and enjoy the fruits of their labour themselves?॥ 37-38॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)