श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 262: जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  12.262.28 
तपोभिर्यज्ञदानैश्च वाक्यै: प्रज्ञाश्रितैस्तथा।
प्राप्नोत्यभयदानस्य यद् यत् फलमिहाश्नुते॥ २८॥
 
 
अनुवाद
यहाँ मनुष्य तप, यज्ञ, दान और ज्ञान के उपदेश से जो-जो लाभ प्राप्त करता है, वह सब उसे अभयदान देने मात्र से प्राप्त हो जाता है ॥28॥
 
Whatever benefits a man obtains here by means of austerity, sacrifices, charity and the teachings of knowledge, he obtains them all by simply giving the gift of fearlessness. ॥28॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)