vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 12: शान्ति पर्व
»
अध्याय 262: जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद
»
श्लोक 2
श्लोक
12.262.2
जाजलिरुवाच
विक्रीणत: सर्वरसान् सर्वगन्धांश्च वाणिज।
वनस्पतीनोषधीश्च तेषां मूलफलानि च॥ २॥
अनुवाद
जाजलि बोले - वैश्यपुत्र! तुम सब प्रकार के रस, गन्ध, वनस्पतियाँ, औषधियाँ, मूल और फल आदि बेचते हो॥2॥
Jajali said – Vaishyaputra! You sell all types of juices, scents, plants, medicines, roots and fruits etc. 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×