श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 262: जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.262.2 
जाजलिरुवाच
विक्रीणत: सर्वरसान् सर्वगन्धांश्च वाणिज।
वनस्पतीनोषधीश्च तेषां मूलफलानि च॥ २॥
 
 
अनुवाद
जाजलि बोले - वैश्यपुत्र! तुम सब प्रकार के रस, गन्ध, वनस्पतियाँ, औषधियाँ, मूल और फल आदि बेचते हो॥2॥
 
Jajali said – Vaishyaputra! You sell all types of juices, scents, plants, medicines, roots and fruits etc. 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)