श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 262: जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  12.262.15 
यदा चायं न बिभेति यदा चास्मान्न बिभ्यति।
यदा नेच्छति न द्वेष्टि ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जब यह पुरुष दूसरों से नहीं डरता, जब अन्य प्राणी भी इससे नहीं डरते तथा जब यह न तो किसी वस्तु की इच्छा करता है और न किसी से द्वेष करता है, तब यह ब्रह्मपद को प्राप्त होता है ॥15॥
 
When this man is not afraid of others, when other creatures are also not afraid of him and when he neither desires anything nor bears hatred towards anyone, then he attains the state of Brahma. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)