श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 262: जाजलि और तुलाधारका धर्मके विषयमें संवाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.262.11 
नाहं परेषां कृत्यानि प्रशंसामि न गर्हये।
आकाशस्येव विप्रेन्द्र पश्यँल्लोकस्य चित्रताम्॥ ११॥
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मण! मैं आकाश के समान निर्लिप्त रहता हूँ और संसार के कार्यों की विचित्रता को देखता हुआ, न तो दूसरों के कार्यों की प्रशंसा करता हूँ और न ही उनकी निन्दा करता हूँ ॥ 11॥
 
O Brahmin! I remain detached like the sky and observing the strangeness of the activities of the world, I neither praise nor criticise the activities of others. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)