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mahabharat 12.261.9: उन अदृश्य भूतों को ऐसा कहते सुनकर महातपस्वी जाजलि ने उनसे पूछा - 'क्या मैं बुद्धिमान एवं प्रसिद्ध तुलाधारक का दर्शन कर सकता हूँ?'॥9॥   |   mahabharat अध्याय 12.261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 261: जाजलिकी घोर तपस्या, सिरपर जटाओंमें पक्षियोंके घोंसला बनानेसे उनका अभिमान और आकाशवाणीकी प्रेरणासे उनका तुलाधार वैश्यके पास जाना  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.261.9 
इत्युक्तो जाजलिर्भूतै: प्रत्युवाच महातपा:।
पश्येयं तमहं प्राज्ञं तुलाधारं यशस्विनम्॥ ९॥
 
 
अनुवाद
उन अदृश्य भूतों को ऐसा कहते सुनकर महातपस्वी जाजलि ने उनसे पूछा - 'क्या मैं बुद्धिमान एवं प्रसिद्ध तुलाधारक का दर्शन कर सकता हूँ?'॥9॥
 
Upon hearing these invisible ghosts say this, the great ascetic Jajali asked them, 'Can I have a glimpse of the wise and famous Tuladharaka?'॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)